जब बैंक आपको होम लोन ऑफर करता है, तो पहला चुनाव फिक्स्ड और फ्लोटिंग ब्याज दर के बीच होता है। असली फर्क यह है कि अगले 15 से 30 साल में दरें बदलने का जोखिम कौन उठाता है।
फ्लोटिंग रेट क्या है?
फ्लोटिंग रेट किसी बाहरी बेंचमार्क के साथ चलता है। भारत में ज़्यादातर नए होम लोन के लिए वह बेंचमार्क आरबीआई की रेपो रेट है। रेपो रेट गिरे तो आपकी दर भी गिर सकती है। बढ़े तो आपकी दर भी बढ़ सकती है। बैंक बेंचमार्क के ऊपर एक तय मार्जिन जोड़ता है, जिसे स्प्रेड कहते हैं। यह स्प्रेड तब तक वही रहता है जब तक आप उस पर दोबारा बात न करें।
फ्लोटिंग लोन ही आम हैं। लगभग हर बड़ा बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनी इन्हें डिफ़ॉल्ट प्रोडक्ट के तौर पर बेचती है।
फिक्स्ड रेट क्या है?
फिक्स्ड रेट आपके तय किए समय तक वही रहता है। कई बैंक इसे सिर्फ शुरुआती कुछ सालों के लिए फिक्स्ड रखते हैं, उसके बाद लोन फ्लोटिंग हो जाता है। फिक्स्ड दरें आमतौर पर फ्लोटिंग से ऊँची होती हैं, क्योंकि दरें उल्टी दिशा में जाने का जोखिम बैंक उठाता है। फिक्स्ड लोन जल्दी बंद करने पर चार्ज भी लग सकता है, जबकि किसी व्यक्ति के फ्लोटिंग लोन पर नहीं लगता।
आमने-सामने
- EMI का भरोसा: फिक्स्ड में EMI स्थिर रहती है, फ्लोटिंग में बदल सकती है।
- शुरुआती दर: फ्लोटिंग आमतौर पर कम होती है।
- दरें गिरने पर फायदा: सिर्फ फ्लोटिंग में।
- दरें बढ़ने पर सुरक्षा: सिर्फ फिक्स्ड में।
- प्रीपेमेंट: व्यक्तियों के फ्लोटिंग लोन पर मुफ्त, फिक्स्ड पर चार्ज लग सकता है।
एक उदाहरण
आप 20 साल के लिए 50 लाख उधार लेते हैं। फ्लोटिंग ऑफर 8.5% का है और फिक्स्ड ऑफर 9.5% का।
- 8.5% पर EMI करीब 43,391 है और कुल ब्याज करीब 54.14 लाख।
- 9.5% पर EMI करीब 46,607 है और कुल ब्याज करीब 61.86 लाख।
फिक्स्ड लोन में आपको हर महीने करीब 3,200 और पूरे लोन में करीब 7.7 लाख ज़्यादा देने पड़ते हैं। यह अतिरिक्त रकम आप बँधी हुई EMI के लिए चुकाते हैं।
अब मान लें कि कुछ साल बाद दरें एक प्रतिशत अंक बढ़ गईं और आपकी फ्लोटिंग दर 9.5% हो गई। तब आपकी EMI फिक्स्ड लोन के बराबर हो जाएगी। अगर इसके उलट दरें एक अंक गिरकर 7.5% हो जाएँ, तो आपकी EMI घटकर करीब 40,280 रह जाएगी, यानी आज के मुकाबले हर महीने करीब 3,100 की बचत। दरें स्थिर रहें या गिरें तो फ्लोटिंग जीतता है। फिक्स्ड तभी जीतता है जब दरें तेज़ी से बढ़ें और ऊँची बनी रहें।
फैसला कैसे लें
- अपना बजट देखें। अगर EMI में 10 से 15% की बढ़ोतरी से आपको दिक्कत होगी, तो फिक्स्ड रेट या बचत का बड़ा बफर रखने का खर्च उठाना ठीक है।
- फर्क देखें। अगर फिक्स्ड दर फ्लोटिंग से करीब एक प्रतिशत अंक से ज़्यादा ऊपर है, तो वह अतिरिक्त खर्च वसूल करना मुश्किल है।
- अपना समय सोचें। अगर आप खूब प्रीपेमेंट करने वाले हैं या कुछ साल में लोन ट्रांसफर करेंगे, तो फ्लोटिंग सस्ता है और उसमें बाहर निकलने की पेनल्टी नहीं है।
- फिक्स्ड अवधि पढ़ें। जो "फिक्स्ड" लोन तीन साल बाद फ्लोटिंग हो जाता है, वह सिर्फ आधा फिक्स्ड है।
आप बदल सकते हैं
आरबीआई के 2023 के सर्कुलर के बाद, बैंकों को फ्लोटिंग लोन वालों को रेट रीसेट के समय फिक्स्ड रेट पर जाने का विकल्प देना होगा, और इसके चार्ज भी बताने होंगे। फ्लोटिंग रेट कम करवाने पर हमारी गाइड में इसके कदम दिए हैं।
सीधा जवाब
अगर आप नौकरीपेशा हैं और EMI में थोड़ा बदलाव झेल सकते हैं, तो फ्लोटिंग आमतौर पर सस्ता पड़ता है और उससे निकलना आसान है। फिक्स्ड तभी चुनें जब दरें बढ़ने से आपके बजट पर सचमुच बोझ पड़े, और दस्तखत करने से पहले असली नंबरों की तुलना कर लें। कैलकुलेटर के कंपेयर पैनल में आप दोनों दरें आमने-सामने आज़मा सकते हैं, और हमारे ब्याज दर पेज पर अलग-अलग बैंकों की आज की दरें देख सकते हैं।